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अंग्रेज़ी, हिंदी की तरफ़ से देखी हुई

जहाँ दोनों भाषाएँ अलग रास्ता पकड़ती हैं, सीखना ठीक वहीं से शुरू होना चाहिए।

आपने शायद कोई एक शब्द खोजा था। mountain मिल गया, आपने याद कर लिया, बात ख़त्म। लेकिन जिस दिन आप उसी शब्द को किसी पूरे वाक्य में डालने बैठते हैं, असली दिक़्क़त शुरू होती है, और वह दिक़्क़त शब्दों की होती ही नहीं।

हिंदी में क्रिया वाक्य के आख़िर में बैठती है। मैंने किताब पढ़ी। अंग्रेज़ी में वही क्रिया बीच में खिसक जाती है: I read the book. छोटे वाक्य में यह अदल-बदल आसान लगती है। पर जैसे ही वाक्य लंबा होता है, हिंदी वाला दिमाग़ पूरी बात सोचकर आख़िर में क्रिया रखने का आदी होता है, जबकि अंग्रेज़ी आपसे माँगती है कि कर्ता बोलने के तुरंत बाद तय कर लें कि हो क्या रहा है। इसीलिए बहुत से लोग अंग्रेज़ी आराम से पढ़ लेते हैं और बोलते हुए बीच वाक्य में अटक जाते हैं।

दूसरी बात और भी बुनियादी है। हिंदी संबंध बताने वाला शब्द संज्ञा के बाद रखती है: मेज़ पर, घर से, दोस्त के लिए। अंग्रेज़ी उसे पहले रखती है: on the table, from home, for a friend. यानी हिंदी की आदत के हिसाब से अंग्रेज़ी का हर प्रीपोज़िशन ग़लत जगह पर खड़ा है। यह कोई कठिन नियम नहीं है, बस हज़ारों बार दोहराई गई एक आदत को उलटना है।

एक और चीज़, जो शायद सबसे प्यारी है। हिंदी में कल बीता हुआ दिन भी है और आने वाला दिन भी। फ़र्क़ शब्द नहीं बताता, क्रिया बताती है। कल आया था और कल आएगा में कल वही रहता है, काल बदल जाता है। अंग्रेज़ी यह छूट नहीं देती। वहाँ आपको मुँह खोलने से पहले ही चुनना पड़ता है, yesterday या tomorrow. एक ही हिंदी शब्द के लिए दो अलग अंग्रेज़ी शब्द, और चुनाव टाला नहीं जा सकता।

और एक ख़ुशख़बरी भी है, क्योंकि सब कुछ मुश्किल नहीं है। हिंदी की क्रिया कर्ता के लिंग से मेल खाती है, वह गया और वह गई, और यह हिसाब हर वाक्य में रखना पड़ता है। अंग्रेज़ी की क्रिया लिंग के हिसाब से कभी नहीं बदलती। he went और she went में क्रिया एक ही है। जो बोझ आप बचपन से उठाते आए हैं, वह यहाँ पूरी तरह उतर जाता है।

नीचे तीन हिस्से हैं: वे शब्द जो दोनों भाषाओं के बीच सीधे नहीं बैठते, वे ध्वनियाँ जो हिंदी में हैं ही नहीं, और व्याकरण की वे चंद गाँठें जो सिर्फ़ हिंदी बोलने वाले को खलती हैं। किसी और की सूची नहीं, आपकी वाली।

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अंग्रेज़ी सीखने के सुझाव

1.

वे शब्द जो सीधे नहीं बैठते

<p>शब्दकोश दो भाषाओं के बीच बराबरी का रिश्ता दिखाता है, पर हक़ीक़त में कई शब्द या तो टूटकर बँट जाते हैं, या रास्ते में अर्थ बदल लेते हैं।</p><p>सबसे पहले वह जगह जहाँ हिंदी तीन चीज़ें रखती है और अंग्रेज़ी एक। <em>तू</em>, <em>तुम</em> और <em>आप</em>, तीनों अंग्रेज़ी में <strong>you</strong> हो जाते हैं। शुरू में यह रूखा लगता है, पर इज़्ज़त का ख़ाना हटा नहीं, जगह बदल गई है। अंग्रेज़ी शिष्टाचार सर्वनाम में नहीं, पूरे वाक्यांश में रखती है। <strong>give me water</strong> सचमुच <em>तू</em> जैसा लगता है; वही बात <strong>could I have some water, please</strong> कहने पर <em>आप</em> वाली हो जाती है। इसलिए विनम्रता के लिए सर्वनाम मत खोजिए, ये ढाँचे याद कर लीजिए: <strong>could you</strong>, <strong>would you mind</strong>, <strong>I was wondering if</strong>.</p><p>अब वे शब्द जिन पर भारत में सबकी सहमति है, पर भारत के बाहर नहीं। भारतीय अंग्रेज़ी अपने आप में पूरी और वैध क़िस्म है, उसमें ग़लत कुछ नहीं। बस विदेशी पाठक तक वह अर्थ नहीं पहुँचेगा जो आप चाहते हैं।</p><ul><li><strong>prepone</strong> बेहद तर्कसंगत शब्द है, पर भारत के बाहर ज़्यादातर लोगों ने सुना ही नहीं है। <strong>can we prepone the meeting</strong> की जगह <strong>can we move the meeting earlier</strong>.</li><li><strong>revert</strong> का अंतरराष्ट्रीय अर्थ है पुरानी हालत में लौट जाना, जवाब देना नहीं। <strong>I will revert to you tomorrow</strong> की जगह <strong>I will get back to you tomorrow</strong>.</li><li><strong>passed out</strong> बेहोश हो जाने के अर्थ में समझा जाता है। <strong>I passed out from college last year</strong> की जगह <strong>I graduated from college last year</strong>.</li><li><strong>out of station</strong> कहीं और चलता ही नहीं। <strong>he is out of station</strong> की जगह <strong>he is out of town</strong>.</li><li><strong>do the needful</strong> पुरानी दफ़्तरी अंग्रेज़ी का बचा हुआ टुकड़ा है। <strong>please do the needful</strong> की जगह <strong>please take care of it</strong>.</li><li><strong>cousin brother</strong> हिंदी की सोच से बना है, जहाँ रिश्ते का पूरा नाम बताना ज़रूरी होता है। अंग्रेज़ी में सिर्फ़ <strong>my cousin</strong> काफ़ी है। उलटी दिशा में यही तंगी खलती है: चाचा, मामा, फूफा और मौसा, चारों सिर्फ़ <strong>uncle</strong>.</li><li>हिंदी में <em>होटल</em> अक्सर खाने की जगह है। अंग्रेज़ी का <strong>hotel</strong> सिर्फ़ रुकने की जगह है, खाने की <strong>restaurant</strong>.</li></ul><p>अब उलटी तरफ़, वे हिंदी शब्द जो अंग्रेज़ी में चले गए और वहाँ जाकर सिकुड़ गए। ये सबसे ज़्यादा धोखा देते हैं, क्योंकि शब्द अपना ही लगता है।</p><ul><li><em>जंगल</em> हिंदी में कोई भी वन या बीहड़ है। अंग्रेज़ी का <strong>jungle</strong> ख़ास तौर पर घना उष्णकटिबंधीय वन है। साधारण जंगल के लिए <strong>forest</strong> या <strong>woods</strong>.</li><li><em>ठग</em> हिंदी में चालाकी से ठगने वाला है। अंग्रेज़ी का <strong>thug</strong> आज हिंसक अपराधी है, शब्द भारी है।</li><li><em>बंगला</em> हिंदी में बड़ा और शानदार घर है। अंग्रेज़ी का <strong>bungalow</strong> ठीक उलटा, एक मंज़िल का छोटा सादा घर।</li><li><em>चंपी</em> से बना <strong>shampoo</strong> कभी सिर की मालिश के लिए था, अब सिर्फ़ बाल धोने का साबुन।</li></ul><p>और आख़िर में दो आदतें, दोनों सीधे हिंदी के ढाँचे से पैदा होती हैं। <em>मैं उसे जानता हूँ</em> का रूप लगातार जैसा लगता है, इसलिए <strong>I am knowing him</strong> निकल जाता है; अंग्रेज़ी में जानने वाली क्रियाएँ लगातार रूप में आती ही नहीं, इसलिए <strong>I know him</strong>. इसी तरह <em>मेरे दो भाई हैं</em> से <strong>I am having two brothers</strong> बनता है, जबकि सही है <strong>I have two brothers</strong>. ये लापरवाही नहीं, हिंदी के तर्क की देन हैं।</p>

2.

उच्चारण: वे ध्वनियाँ जो हिंदी में हैं ही नहीं

<p>पहले वह बात जो आपके हक़ में जाती है। हिंदी में हवा का झोंका अर्थ बदल देता है: <em>कान</em> और <em>खान</em>, <em>पल</em> और <em>फल</em>। अंग्रेज़ी में यह फ़र्क़ मौजूद तो है, पर अर्थ नहीं बदलता: <strong>pin</strong> में झोंका है, <strong>spin</strong> में नहीं, और अंग्रेज़ी बोलने वाले को ज़िंदगी भर इसका पता तक नहीं चलता। यानी आपके कान एक ऐसा भेद पकड़ते हैं जिसे अंग्रेज़ी अनदेखा करती है। यह कमी नहीं, बढ़त है।</p><p>अब सबसे बड़ी ग़लतफ़हमी, और यही सबसे आम ग़लती भी है। <strong>think</strong> और <strong>this</strong> की पहली आवाज़ हिंदी की थ और ध नहीं है। थ और ध स्पर्श ध्वनियाँ हैं: जीभ दाँतों को छूकर हवा को पूरी तरह रोकती है, फिर हवा एक झटके में छूटती है। अंग्रेज़ी की यह आवाज़ संघर्षी है: जीभ की नोक ऊपर के दाँतों के किनारे पर हल्की-सी टिकी रहती है, हवा कहीं रुकती नहीं, लगातार बहती रहती है। पहचान का आसान तरीक़ा: अंग्रेज़ी वाली आवाज़ को आप चाहें तो कई सेकंड तक खींच सकते हैं, साँप की फुफकार की तरह। थ को नहीं खींचा जा सकता, वह एक झटके में ख़त्म हो जाती है। इसके दो रूप हैं, बिना गूँज वाला <strong>think</strong>, <strong>thin</strong>, <strong>bath</strong>, और गूँज वाला <strong>this</strong>, <strong>then</strong>, <strong>brother</strong>. शीशे के सामने अभ्यास कीजिए, जीभ की नोक दिखनी चाहिए।</p><p>दूसरी उलझन होंठों की है। हिंदी का <em>व</em> अकेला वह काम करता है जो अंग्रेज़ी दो अलग ध्वनियों से करती है। इसीलिए <strong>vine</strong> और <strong>wine</strong>, <strong>vest</strong> और <strong>west</strong>, <strong>very</strong> और <strong>wary</strong> एक जैसे निकल जाते हैं। फ़र्क़ पूरी तरह होंठ और दाँत का है। <strong>v</strong> के लिए ऊपर के दाँत नीचे के होंठ पर रखिए और आवाज़ को वहाँ घिसने दीजिए। <strong>w</strong> में दाँत का कोई काम नहीं, बस होंठ गोल कीजिए, जैसे <em>ऊ</em> बोलने जा रहे हों, और शब्द वहीं से शुरू कीजिए। उँगली होंठ पर रखकर दोनों बोलिए, फ़र्क़ छूकर महसूस होगा।</p><p>तीसरी चीज़ वह है जिससे भारतीय लहजा सबसे जल्दी पहचाना जाता है। हिंदी की ट और ड मूर्धन्य हैं, जीभ पीछे मुड़कर तालु को छूती है। अंग्रेज़ी की <strong>t</strong> और <strong>d</strong> वहाँ बनती ही नहीं, वे दाँतों के ठीक पीछे वाले उभार पर बनती हैं, यानी हिंदी की त और ट के बीच कहीं। <strong>table</strong>, <strong>doctor</strong>, <strong>letter</strong> में जीभ जितनी आगे लाएँगे, आवाज़ उतनी क़रीब पहुँचेगी। यह ग़लती नहीं है, पर अगर आप चाहते हैं कि अनजान कान को शब्द पहचानने में देर न लगे, तो असर देने वाली जगह यही है।</p><p>आख़िर में वह चीज़ जिस पर ध्यान सबसे कम जाता है और जो सबसे ज़्यादा फ़र्क़ डालती है। हिंदी में ज़ोर अक्षर के भार से तय होता है और पूरे वाक्य में काफ़ी बराबर बँटा रहता है। अंग्रेज़ी में ज़ोर की जगह चलती-फिरती है, और उसके बदलने से शब्द का काम तक बदल जाता है। <strong>present</strong> पर पहले हिस्से में ज़ोर दीजिए तो तोहफ़ा है, दूसरे में दीजिए तो पेश करना। <strong>record</strong> के साथ भी यही खेल चलता है। इसके अलावा जिन हिस्सों पर ज़ोर नहीं पड़ता, उनके स्वर दब जाते हैं। <strong>banana</strong> में तीन बराबर आ नहीं हैं, सिर्फ़ बीच वाला साफ़ है, बाक़ी दोनों लगभग निगल लिए जाते हैं। इसलिए हर अक्षर को साफ़-साफ़ और बराबर बोलना, जो हिंदी में सुथरा लगता है, अंग्रेज़ी में उलटा असर करता है।</p>

3.

व्याकरण: क्रम, आर्टिकल और वह अकेला बचा हुआ मेल

<p>अंग्रेज़ी का व्याकरण हिंदी के मुक़ाबले छोटा है, पर वह जहाँ सख़्त है, हिंदी वहीं ढीली है। पहले क्रम। हिंदी में क्रिया आख़िर में बैठती है और उससे पहले जितना चाहें उतना सामान भरा जा सकता है। <em>मैंने अपने भाई को वह किताब दी जो मैंने बाज़ार से ख़रीदी थी।</em> अंग्रेज़ी उलटा चलती है: <strong>I gave my brother the book that I bought at the market</strong>. क्रिया दूसरे शब्द पर ही आ चुकी है। यानी बोलना शुरू करने से पहले तय हो जाना चाहिए कि हुआ क्या।</p><p>और क्रम यहाँ शैली नहीं, अर्थ है। हिंदी में <em>ने</em> और <em>को</em> बता देते हैं कि कर कौन रहा है और हो किस पर रहा है, इसलिए शब्द इधर-उधर हों तो भी बात नहीं बिगड़ती। अंग्रेज़ी में ऐसा निशान है ही नहीं। <strong>the dog bit the man</strong> और <strong>the man bit the dog</strong> में एक भी शब्द नहीं बदला, सिर्फ़ जगह बदली, और अर्थ पलट गया।</p><p>फिर परसर्ग बनाम प्रीपोज़िशन। हिंदी संज्ञा के बाद रखती है, <em>मेज़ पर</em>, अंग्रेज़ी पहले, <strong>on the table</strong>. और यह चुनाव अक्सर तर्क से नहीं, आदत से तय होता है, इसलिए इन्हें नियम की तरह नहीं, शब्द से चिपके हुए हिस्से की तरह याद कीजिए: <strong>depend on</strong>, <strong>listen to</strong>, <strong>afraid of</strong>. हिंदी के <em>इस बारे में चर्चा करना</em> से <strong>discuss about it</strong> निकल जाता है, जबकि सही है <strong>discuss it</strong>.</p><p>सवाल में हिंदी बस <em>क्या</em> जोड़ देती है। अंग्रेज़ी क्रम पलट देती है, और जहाँ सहायक क्रिया नहीं होती वहाँ <strong>do</strong> को बुला लेती है: <strong>do you know him</strong>.</p><p>अब सबसे बड़ी गाँठ, आर्टिकल। हिंदी में यह चीज़ है ही नहीं, इसलिए वाक्य बनाते समय कोई ख़ाली ख़ाना दिखता तक नहीं। असल तर्क एक ही सवाल है: यह चीज़ सुनने वाले के लिए नई है, या पहले से तय? नई हो तो <strong>a</strong>, तय हो तो <strong>the</strong>. हिंदी यही काम <em>एक</em> से और शब्द की जगह से कर लेती है: <em>एक आदमी आया। आदमी ने कहा...</em> दूसरी बार सिर्फ़ <em>आदमी</em>, क्योंकि अब वह जाना-पहचाना है। यानी: <strong>a man came in. the man said...</strong></p><p>इसी वजह से <strong>I am going to office</strong> और <strong>He is doctor</strong> इतने आम हैं। हिंदी में <em>मैं दफ़्तर जा रहा हूँ</em> और <em>वह डॉक्टर है</em> पूरे वाक्य हैं, कुछ छूटा हुआ महसूस ही नहीं होता। अंग्रेज़ी में वह दफ़्तर वही है जिसे दोनों जानते हैं, इसलिए <strong>I am going to the office</strong>; और डॉक्टर एक श्रेणी है जिसमें से वह एक हैं, इसलिए <strong>He is a doctor</strong>. एक छूट: जब इमारत नहीं, काम मायने रखता है, तो आर्टिकल हट जाता है, <strong>she went to school</strong>.</p><p>आख़िर में राहत, और उसके साथ एक काँटा। हिंदी की क्रिया कर्ता के लिंग से मेल खाती है। अंग्रेज़ी की क्रिया लिंग पहचानती ही नहीं: <strong>he went</strong>, <strong>she went</strong>, क्रिया वही रही। पर एक मेल अंग्रेज़ी ने बचा रखा है, और अकेला होने की वजह से ही वह भूलता है: वर्तमान में तीसरे पुरुष एकवचन पर <strong>s</strong>. <strong>he plays</strong>, पर <strong>they play</strong>. भूतकाल में यह भी ग़ायब: <strong>he played</strong>, <strong>they played</strong>. और हिंदी का <em>वह</em> लिंग नहीं बताता, जबकि <strong>he</strong> और <strong>she</strong> बताना अनिवार्य करते हैं, इसलिए बात करते-करते ग़लत वाला निकल जाता है। किसी का ज़िक्र शुरू करते ही मन में एक बार लिंग तय कर लीजिए।</p>

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

हिंदी बोलने वालों के लिए अंग्रेज़ी में सबसे मुश्किल चीज़ क्या है?

आर्टिकल, यानी a, an और the। हिंदी में यह श्रेणी है ही नहीं, इसलिए वाक्य बनाते समय कोई ख़ाली ख़ाना नज़र नहीं आता जिसे भरना हो। नियम रटने के बजाय हर बार एक सवाल पूछिए: यह चीज़ सुनने वाले के लिए नई है या पहले से तय? नई हो तो a, और तय हो तो the।

पढ़ना आसान लगता है, पर बोलते समय बीच वाक्य में क्यों अटक जाता हूँ?

क्योंकि हिंदी क्रिया को आख़िर में रखती है और अंग्रेज़ी बीच में। हिंदी में आप पूरी बात सोचते-सोचते आख़िर में क्रिया रख देते हैं, जबकि अंग्रेज़ी में कर्ता बोलते ही तय करना पड़ता है कि हो क्या रहा है। यह समझ की नहीं, आदत की दिक़्क़त है, और छोटे-छोटे वाक्य ज़ोर से बोलने के अभ्यास से सबसे तेज़ी से जाती है।

think और this की आवाज़ हिंदी की थ और ध से कैसे अलग है?

थ और ध में जीभ दाँतों को छूकर हवा को रोकती है और फिर वह एक झटके में छूटती है। अंग्रेज़ी की इन आवाज़ों में हवा कहीं रुकती ही नहीं, जीभ की नोक ऊपर के दाँतों के किनारे टिकी रहती है और हवा लगातार बहती है। जाँच आसान है: अंग्रेज़ी वाली आवाज़ को कई सेकंड तक खींचा जा सकता है, थ को नहीं।

क्या भारतीय अंग्रेज़ी ग़लत अंग्रेज़ी है?

नहीं। भारतीय अंग्रेज़ी अपनी जगह एक पूरी और वैध क़िस्म है, ठीक जैसे ब्रिटिश या ऑस्ट्रेलियाई अंग्रेज़ी। बात सिर्फ़ पाठक की है। prepone, revert और out of station जैसे शब्द भारत में साफ़ समझ आते हैं, पर बाहर के पाठक तक वह अर्थ नहीं पहुँचेगा, इसलिए विदेश के लिए लिखते समय इन्हें बदल दीजिए।

v और w एक जैसे क्यों निकलते हैं, और इन्हें अलग कैसे करें?

क्योंकि हिंदी का व अकेला वह काम करता है जो अंग्रेज़ी दो ध्वनियों में बाँटती है, इसलिए vine और wine एक हो जाते हैं। फ़र्क़ पूरी तरह होंठ और दाँत का है: v के लिए ऊपर के दाँत नीचे के होंठ पर टिकाइए, और w के लिए दाँत बिलकुल मत छुइए, बस होंठ गोल कीजिए जैसे ऊ बोलने जा रहे हों।

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